दान बना अधर्म

दान बना अधर्म

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दान बना अधर्म

दान बना अधर्म  ⇒ कभी – कभी दान करना उसका परिणाम गलत हो जाता है | इसीलिए दान देने से पहले सोचने समझने की आवश्यकता है | क्या किसी को दान देना चाहिए या नही |

दान बना अधर्म
किसी भी भूखे व्यक्ति को भोजन करना तथा निवस्त्र को वस्त्र वो भी सिलाया हुआ |
उचित होता है | उसके बदले में भिख देने में अनाज व रुपया पैसा देना अनुचित हो जाता है |
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दान बना अधर्म

एक दुगी नाम के व्यक्ति नट जाती का था |
वो भिख मांगकर अपने पत्नी झरिया एवं गोलू बचा व बची भूली के जीवन चलाता था |
दुगी नाहर की एक छोड़ पर झोपड़ी लगाकर रहता था |
उसके अगल – बगल और भी झोपड़ पट्टी बनी हुई थी |
एक दिन वे भिख मांगने के लिए गाँव देहात में गया |
और दो रुपया , पांच रुपया काके उसी दिन दो सौ पचासी रुपये की आमदनी हो गयी |
लेकिन समय और हलात को कौन जनता है |
उसी क्रम में एक दानी व्यक्ति के दवार पर चला जाता है |
वे व्यक्ति ने दुगी भिखारी को बुलाकर 50 रुपये दे दिए |
भिखारी ने पैसा लेकर अपने झोपड़ी की ओर चल दिया | लेकिन उसका झोपड़ी चार पांच किलोमीटर की दुरी पर था | रस्ते में जाते समय कई गाँव से गुजरा | एक गाँव में शराब बंदी के बावजूद शराब की बिक्री किया जाता था |
दान बना अधर्म ” नशा की लत आदमी को बेचैन किया रहता है | पास में पैसा हो | पैसा का मालिक स्वयं हो | नशा का लत हो तो कोई भी आदमी नशा के वश में हो जाता है | पचास रुपया का दान और अधिक आमदनी | दुगी सोचा क्यूँ न आज शराब पि लिया जाये | दुगी ने शराब पी लिया | शराब का नशा हवा की झोक से और बढ़ गया | घर जाते जाते गिरने लड़खड़ाने की स्थिति में हो गया | किसी तरह भिखारी ने अपने घर पहुंचा |
घर पहुचने पर झरिया ने देखी तो देखते ही खीश सात असमान पर चढ़ गया | पति की झोरी आदि छीन झपटकर देखने पर 140 रुपये ही मिले | वो पैसा निकलकर खरी खोटी सुनाने लगी | दुगी और झरिया के आपस में तू – तू  में में होने लगी | इसी तरह बात आगे बढ़ गयी | तिर का तार बन गया | दुगी ने और पचास रुपये मांगने लगा | लेकिन पत्नी ने पैसा देना नही चाही | इसी क्रम में बात बढ़ते गया | दुगी ने धारदार हथियार निकालकर पीछे से मौका पाकर गर्दन पर वार कर दिया | और पत्नी का जान ले लिया | पत्नी के हाथ में सभी पैसा था | पैसा लेकर दुगी ने फरार हो गया |
दान बना अधर्म
उस दानी व्यक्ति का किया हुआ दान और लोगो द्वारा दिया हुआ दान धर्म अधर्म में बदल गया |
(Auther by DAROGA SINGH)

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